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मन को जगत् की बातों से खाली करें | आस्तिकता की आधारशिलाएँ | परम पूज्य श्री राधा बाबा

🕉️ आस्तिकता की आधारशिलाएँ

(पृष्ठ 57–59 से प्रतिलिप)

मन को जगत् की बातों से खाली करके प्रियतम प्राणनाथ की छवि के स्मरण से भरें

जब तक हम परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करेंगे, व्याकुल रहेंगे। जिस दिन प्रभु के विधान पर विश्वास कर लेंगे, उसी क्षण सारा दुःख मिट जाएगा। अवश्य पढ़ें/सुनें।

पारिवारिक उलझनों को लेकर आपको उद्वेग होता है, यह स्वाभाविक है; पर जब तक इससे छूटने का जो वास्तविक उपाय है, उसे नहीं करेंगे, तब तक व्याकुलता मिटनी और उद्वेग मिटना बड़ा ही कठिन है। परमार्थ के पथिक के लिये यह सर्वथा उड़ा देने की चीज़ है।

पर आपका मन कमजोर है; मन में आसक्ति है और सबसे बड़ी बात यह है कि आपका मन जैसा प्रभु के चरणों में लगना चाहिये वैसा नहीं लग रहा है। इसलिये ये उलझनें विकट रूप में दीख रही हैं। सच मानिये, बहुत अधिक आवश्यकता इस बात की है कि आप इन परिस्थितियों को बिल्कुल महत्त्व न देकर एकान्त एवं शान्तचित्त से अपना मन प्रभु के चरणों में लगाने की चेष्टा करें।

यदि आप चाहेंगे कि परिस्थिति पलटे तो ऐसा होना बड़ा ही कठिन है।

इसका कारण यह है कि जगत् के प्रत्येक प्राणी की प्रत्येक चेष्टा के क्षुद्र-से-क्षुद्र अंश का नियन्त्रण भगवान् की शक्ति से होता है और उसमें कितना मंगल, किसका कैसे होता है, इसे केवल भगवान् जानते हैं। पर मंगल-ही-मंगल होता है, यह प्रत्येक संत का प्रत्यक्ष अनुभव है।

अतः आपकी दृष्टि में आपके मन से सर्वथा प्रतिकूल चेष्टा करने वाले की प्रत्येक चेष्टा उनकी शक्ति से नियंत्रित है। वे चाहें तभी वे पलट सकती हैं, अन्यथा नहीं पलटेंगी — इस बात पर विश्वास होना बड़ा कठिन है। नहीं तो यह विश्वास होते ही सारा दुःख तत्क्षण मिट जाय।

आप इस फेर में मत पड़िये कि:

“मेरा व्यवहार कैसे सुधरे, मैं अपने परिवार के व्यक्तियों से कैसा आचरण करूँ कि उनका और मेरा परम कल्याण हो।”

आप उनकी चिन्ता छोड़ दीजिये और यह चिन्ता भी छोड़ दीजिये कि:

“मेरा व्यवहार सुधर जाय; ऐसा हो जाय कि वे लोग मुझसे प्रसन्न हो जाएँ।”

ऐसा विचार करना लाभदायक होता है, पर सबके जीवन में सब अंशों में एक प्रकार की साधना का क्रम नहीं हो सकता। संसार के प्रति उपरामता को देखते हुए बार-बार मन की बिखरी हुई वृत्तियों को इस कोलाहल से हटाकर नित्य सुखमय प्रभु के चरणों में जोड़ते रहना — आप इसे ही करें।

यदि आप मन को जगत् एवं घर की बातों से खाली करके प्रियतम प्राणनाथ की छवि के स्मरण से भरेंगे तो ये बातें इतनी तुच्छ प्रतीत होंगी कि उसकी कल्पना भी नहीं हो सकती। भगवान् की पूर्ण कृपा आप पर है। इतना ही नहीं, ये जटिल समस्याएँ भी आपको कीचड़ से निकालने के ही उपक्रम हैं।

हृदय का एक बड़ा अंश अभी सांसारिक आसक्तियों से घिरा हुआ है। शायद आपको पता भी नहीं चलता होगा कि वह आसक्ति कैसी है, कहाँ है, किस रूप में है; पर वह है। इन सारी आसक्तियों को छोड़ने के लिये तैयार होना पड़ेगा। छूटेगी तो प्रभु के छुड़ाये, पर चाह आपको ही करनी पड़ेगी।

सारांश यह है कि जिस-किसी भी प्रकार से मन को इन उलझनों को सुलझाने में न लगाकर इनको भूलने की चेष्टा करें। थोड़ा कठिन है, पर प्रभु सहायक हैं; सब हो सकता है।

आप गृहस्थ हैं और जब तक प्रभु चाहेंगे, तब तक उसमें रहना ही पड़ेगा। फलतः जीवन-निर्वाह के लिये भी चेष्टा करनी ही पड़ेगी। उसे कीजिये; कमाते हैं तो न्याय की कमाई हो और उससे जो प्राप्त हो, उसे आपके परिवार की जो सँभाल कर रहे हों उन्हें सौंप दीजिये।

घर में सबसे सम्मान, प्रेम, हित और सत्य — इन चारों बातों को ध्यान में रखकर ही व्यवहार कीजिये। बड़ी शान्ति से रहिये। किसी दूसरे की अशान्ति से यदि आप अशान्ति मोल लेते हैं तो भूल करते हैं।

ध्यान रखिये — कुछ भी अनहोनी नहीं होगी, एक पत्ता भी प्रभु के विधान से ही हिलेगा।

सुख-दुःख, निन्दा-स्तुति, इज्जत-बेइज्जती — सब ठीक नियम से आयेंगे, उनके विधान से आयेंगे।
इस पर विश्वास करें; न करने से दुःख बढ़ेगा।

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